युगान्तर

वो सुबह कभी तो आयेगी..............

महंगी पड़ी काग्रेस..

दिल्ली चुनावों में भाजपा के चुनाव की पंच लाईन.. कहते है अरुण जेटली के दिमाग की उपज थी..."महंगी पड़ी काग्रेस.. ".. भाजपा को वोट दें...

शायद अरुणजी दिल्ली की जनता को नहीं जानते, वो मंहगी चीजें ही पंसद करेती है.... तभी तो शीला जी आन 45 का आंकडा के खुश हो रही है...और ये स्लोगन अब अरुण जी को मंहगा पड़ गया..

मत ध्यान बटाओं हमारा...

मुंबई में आतंकी हमले के बाद अंग्रेज दुम दबा कर भाग गये... ७-० से हारने से बेहतर था ५-० से हारना..

पूरा देश नेताओं से हिसाब माँग रहा है और आम आदमी इंसाफ कि उम्मीद में खडा़ है.. हम आक्रोशीत है.. और action चाहते है.. नेता अपना मानसिक संतुलन खो चुके और ’बक’ रहे है..

शायद जनता का ये आक्रोश वो झेल नहीं पा रहे और action लेने की हिम्मत है नहीं.. हमारा और मिडिया का ध्यान बांटने अब वो नई साजिश कर रहे है... भगौडे़ अंग्रेजो को फि़र से बुला रहे है.. सोचते है.. कि हम क्रिकेट देखेगें.. और थोडे दिनों में भूल जायेगें मुंबई को..

सावधान.. ये कोशिश कामयाम न होने देगें.. नहीं देखना हमें गिल्ली डण्डे का खेल..
मत कोशिश करों हमारा ध्यान बांटने की..
हमे हिसाब दो..
इंसाफ दो..

कौन कह गया कि फलों से लदे पेड झुकते है.....?

बडी उम्मिद से २-३ महिने पहले टिकट बनवाई थी.. गर्मी कि छुट्टीयों मे नानी के घर जायेगे.. छुट्टी मे घुमने किसी हिल स्टेशन जायेगे.. गांव जायेगे.. शहर जायेगे.... पता नही.. क्या क्या.. लेकिन १५ दिन हो गये.. सब अपनी जगह खडे है.. या ये कहे कि अडे है.. और आप हम जैसे आम आदमी अटके है.. ..
अटकन के इस समय मे एक बात और अटक गई है.. और इस बार अटकन भी बडी अजीब है.. या कहे कि ये अटकन नहीं अकड है...महारानी साहिबा कि..महारानी इसलिये क्योंकि.. मुख्यमंत्री तो जनता का होता है...

अब मुद्दे पर.. महारानी ने बयाना जाने से मना कर दिया.. कहती है..कि.."बयाना मे एसी कोइ जगह नहीं है जहां बात हो सके.."
महारानी भुल गई कि वो १२ दिन पहने बात करने ही बयाना गई थी.. तब बैसला जी पीलुपुरा में अटके थे.....महारनी ने पीलुपुरा जाने से मना कर दिया... कहा.. बयाना आओ...अब बैसला जी..१२ दिन मे ३० किमी चल के बयाना आये है..तो महारानी जयपुर बुला रही है...पता नही बात करने मे जगह क्या भुमिका अदा करती है...और १२ दिनों मे उस जगह को क्या हो गया..
बैसला जी आप तो वहीं जमे रहो... क्योकीं इस स्पीड से आप जयपुर जाओगे... तब तक हो सकता है.. महारनी.. चली जाए... इलेक्शन आने को है.. आप तने रहो..

कोइ मेरे सब्र का इंतिहान ना ले!!

राजस्थान के गृह मंत्री ओर मुख्यमंत्री को ये कहते हुये रोज सुना जा सकता है.. ये साहब और साहिबा ये नहीं बता रहे है कि इनके सब्र कि सीमा क्या है? ये कब कहेगे ...ओर नहीं..बस ओर नहीं

६-७ दिन हो गये.. रास्ते बन्द है.. ट्रेन जा नहीं रही.. जनजीवन अस्त व्यस्त है.. ओर कोइ कुछ नहीं कर रहा.. इन्तजार के सिवा... दोनो पक्ष अडे है... ओर संवादहिनता कि स्थति बनी हुई है..

लगने लगा है राजस्थान मे सरकार नाम कि कोई चिडिया नहीं है... ओर बैसला साहव अहिंसा ओर आन्दोलन के नाम पर लाखों लोगो का जीना हराम कर रखे है..

इन्होने पिछली बार भी इसी तरह से सरकार को बन्दी बनाया था.. सरकार अपने हाथ जला चुकि थी.. स्पष्ट है कि सरकार ने कोइ सिख नही ली.. ओर भविष्य के लिये कोई रणनिति नहीं बनाई.. चंद IAS ओर IPS के तबादले कर सोच लिया कि सब ठीक हो जायेगा..

आस्तिकता की हद है.. लेकिन ये भुल गये कि ईश्वर उनकी मदद करता है जो खुद अपनी मदद करते है.... या फिर ये सब इश्वर कि लिला समझ के मुक दर्शक बने है...

हे माता वसुन्धरा.. हे अन्न्पुर्णा देवी... हे महारानी... (आपके समर्थक आपको यही कहते है)... कृपा करें.. कुछ करें.. ओर मेरे मरुधर देश का अमन लौटा दिजीये..

शांतिपुर्ण आन्दोलन का आगाज - ५ मरे

कर्नल बैसला के अहिंसात्मक - शांति पुर्वक आन्दोलन का आगाज हो गया.. अब से लगभग ३ घण्टे पहले.. अब तक ५ लोग मारे जा चुके है.. जान, माल, सुख, चैन, शान्ति, हसी गिरवी रख के आरक्षण लोगे क्या ? राजनैतिक लडाई मे आम जनता क्यो पिसे..... शान्ति..शान्ति..शान्ति... इश्वर सद्बुधि दे....

गांधीजी!!! आप भी सीख लो!

बैसला जी, राजस्थान में रेल रोकेगें.. अंहिसात्मक तरीके से.. पिछली बार देखी थी अहिंसा? आज फिर है.. गांधीजी आप सुन रहे है ना..आ जाओ वापस अगर सीखना है तो.

हमारे लिए भी भारत रत्न !!

अडवाणी जी ने अटल जी के लिये भारत रत्न क्या मागां .. अचानक उनके सभी सोये साथी जाग गये. जैसे राशन की दूकान पर "मिट्टी के तेल" आने कि खबर लगते ही सभी कतार लगा देते है.... पुरा हजुम आ गया..

तो शायद अडवाणीजी को खबर लगी कि इस बार भारत रत्न बटने वाला है तो उन्होने बडी इमानदारी से अटलजी का नाम आगे कर दिया.. इमानदारी इसलिये कि उन्होने अपना नाम आगे नहीं किया.. फिर क्या था हर रोज .. सुबह, दोपहर, शाम नये नये नाम आने लगे.. सभी को एक ही चीज चहिये थी .."भारत रत्न"..

माया को काशीराम के लिये..
अजित सिहं को अपने पिताजी चौधरी चरण सिहं के लिये...
डी एम के को करुणानिधि के लिये..
नवीन पटनायक को अपने बिजु पटनायक के लिये...
मुलायम सिह को लोहिया जी के लिये
पसवान को रफी साहब और कपुरी ठाकुर के लिये..
और न जाने किन किन को किन किन के लिये..

मिडिया ने भी शटर खोल दिये.... SMS मागने शुरु कर दिये.. कुछ नये नाम आगे कर दिये.. टाटा, तेन्दुलकर, वगैराह वगैराह..

ये सब देख सुन पढ हमें लगा कि लगे हाथ हम भी अपने लिये "भारत रत्न" मांग लेते है... (कहीं अगर इनमे सहमति न बने तो "निर्दलीय" का नम्बर या जाये.. जैसे मधु कोडा कि किस्मत चमकी)..

तो हम आप लोगो के मध्यम से अपने लिये भारत रत्न मांग रहे है.... क्यों?

सबसे बडी बात तो ये कि हम इन सभी महान लोगो के होते हुए जी रहे है.. रोज ब्लु लाइन से टकराते चल रहे है....

कमर तोड मंहगाए से झुझ रहे है.. हर गम हसते हसते झेल रहे है..

बेरोजगारी, भष्टाचार से मुकाबला कर रहे है... बच्चो के लिये एक अदद स्कुल को तरस रहे है...

इलाज के लिये इंतजार कर रहे है.. दवा खरिदने के लिये घर का सामान बेच रहे है..

बारिश की उम्मीद मे खेत जोत रहे है.. और जब खुदा मेहरबान हो तो नकली खाद और दवाइयों से छले जा रहे हें.

कर्ज मे डुबे आत्महत्या कर रहे है... राहत की रोटी के उम्मीद मे जी रहे है....

यह सब झेल कर भी चुपचाप आपके किये वोट दे रहे है.. आप साहेब को संसद मे लडता, सोता देख कर भी मुह बन्द कर बैठे है.. आपके हर घोटाले पर आखे मुद ले रहे है.. आपके हर चमचे कि झिडक खा रहे है..

आपके होते हुये भी हम जी रहे है.. इससे बडी उपलब्धी आपको क्या चहीये.. एक अदद भारत रत्न बचा है उसे तो हमारे लिये छोड जाइये.. इस बार का भारत रत्न हमको दे जाइये...

हमारे लिए भी भारत रत्न !!

अडवाणी जी ने अटल जी के लिये भारत रत्न क्या मागां .. अचानक उनके सभी सोये साथी जाग गये. जैसे राशन की दूकान पर "मिट्टी के तेल" आने कि खबर लगते ही सभी कतार लगा देते है.... पुरा हजुम आ गया..

तो शायद अडवाणीजी को खबर लगी कि इस बार भारत रत्न बटने वाला है तो उन्होने बडी इमानदारी से अटलजी का नाम आगे कर दिया.. इमानदारी इसलिये कि उन्होने अपना नाम आगे नहीं किया.. फिर क्या था हर रोज .. सुबह, दोपहर, शाम नये नये नाम आने लगे.. सभी को एक ही चीज चहिये थी .."भारत रत्न"..

माया को काशीराम के लिये..
अजित सिहं को अपने पिताजी चौधरी चरण सिहं के लिये...
डी एम के को करुणानिधि के लिये..
नवीन पटनायक को अपने बिजु पटनायक के लिये...
मुलायम सिह को लोहिया जी के लिये
पसवान को रफी साहब और कपुरी ठाकुर के लिये..
और न जाने किन किन को किन किन के लिये..

मिडिया ने भी शटर खोल दिये.... SMS मागने शुरु कर दिये.. कुछ नये नाम आगे कर दिये.. टाटा, तेन्दुलकर, वगैराह वगैराह..

ये सब देख सुन पढ हमें लगा कि लगे हाथ हम भी अपने लिये "भारत रत्न" मांग लेते है... (कहीं अगर इनमे सहमति न बने तो "निर्दलीय" का नम्बर या जाये.. जैसे मधु कोडा कि किस्मत चमकी)..

तो हम आप लोगो के मध्यम से अपने लिये भारत रत्न मांग रहे है.... क्यों?

सबसे बडी बात तो ये कि हम इन सभी महान लोगो के होते हुए जी रहे है.. रोज ब्लु लाइन से टकराते चल रहे है....

कमर तोड मंहगाए से झुझ रहे है.. हर गम हसते हसते झेल रहे है..

बेरोजगारी, भष्टाचार से मुकाबला कर रहे है... बच्चो के लिये एक अदद स्कुल को तरस रहे है...

इलाज के लिये इंतजार कर रहे है.. दवा खरिदने के लिये घर का सामान बेच रहे है..

बारिश की उम्मीद मे खेत जोत रहे है.. और जब खुदा मेहरबान हो तो नकली खाद और दवाइयों से छले जा रहे हें.

कर्ज मे डुबे आत्महत्या कर रहे है... राहत की रोटी के उम्मीद मे जी रहे है....

यह सब झेल कर भी चुपचाप आपके किये वोट दे रहे है.. आप साहेब को संसद मे लडता, सोता देख कर भी मुह बन्द कर बैठे है.. आपके हर घोटाले पर आखे मुद ले रहे है.. आपके हर चमचे कि झिडक खा रहे है..

आपके होते हुये भी हम जी रहे है.. इससे बडी उपलब्धी आपको क्या चहीये.. एक अदद भारत रत्न बचा है उसे तो हमारे लिये छोड जाइये.. इस बार का भारत रत्न हमको दे जाइये...

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