अभी तो हमारी ट्रेनिंग होनी है..
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राजनीतिक विधवा ??
विवेक जी ने आज अखबारों के भाषा प्रयोग पर एक पोस्ट की.. उसी अखबार (नवभारत टाइम्स) के संपादकिय पृष्ठ पर महिला आरक्षण के पक्ष में एक लेख आज प्रकाशित हुआ.. उसका ये वाक्य देखिये..
".... सबसे ज्यादा 12 महिलाएं संसद में पहुंचाने वाले राज्य यूपी की बात करें तो यहां की महिला सांसदों में से तीन राजनीतिक विधवाएं, तीन राजनेताओं की पत्नियां, दो बहू और एक बेटी है...."
राजनीतिक विधवा क्या शब्द हुआ? कितना अपमानजनक है.... क्या शब्दों का चयन करते हुऐ इतनी सावधानी नहीं रख सकते?
खुद की अक्ल कहां गई थी?
कल से एक समाचार सारे न्युज चैनल पर छाया हुआ है कि एक डॉ रुपये ने तिगुने करने का झांसा देकर करोडो की ठगी की.. सभी उस डा के बारे में बात कर रहे है, चर्चा हो रही है कि उसने किस तरह ठगी की, कब से शुरु किया, वगैरह वगैरह....
ये तस्वीर का एक पहलु है, इसका दुसरा पहलु भी देखना समझना जरुरी है... जरा गौर किजिये यह आदमी सालों से इस ठगी में सलग्न है.. ११ रा्ज्यों में उसका नेटवर्क फैला था, और उसने लाखों आदमीयों को ठगा.. दिन के उजाले में...कौन जिम्मेदार है वो डॉक्टर? नहीं, वो तो इस पुरे चक्र का एक छोटा सा पात्र है, क्यों लाखों लोग इतने समझदार निकले जो मान गये कि कोई उन्हें जादुई शक्तियों से रकम तिगुनी कर देगा.. क्या वो सारे के सारे नासमझ थे कि ठगी का ये मामुली खेल नहीं समझ पाये? शायद नहीं. मुझे एक किस्सा याद है सन १९९३-९४ के आस पास का, जोधपुर में एक एजेंसी खुली "वेंकटेश एण्टरप्राईजेज" के नाम से... उसकी स्कीम देखिये १०००० रुपये की वस्तु आपको ४००० रु में मिलेगी.. आप ५०० रू प्रतिदिन के हिसाब से ८ दिन रुपये जमा करवाईये ९ वें दिन वो वस्तु आप घर ले जाइये...कितना सरल... समय के साथ उसने २००००, ३०००० रु की चीजें भी ओफर करना शुरु कर दिया... खुब धुम धाम से चली से स्कीम .. शुरु के दिनों में उसने कई लोगों को सस्ती चीजें दी... तो क्या लोगों का भरोसा जीत लिया उसने? नहीं.. सभी जानते थे कि वो ठग है और वो शहर से भागेगा.. पर वो ये सोच कर रुपये जमा करवा रहे थे कि इतना जल्दी नहीं भागेगा.. इसी चक्कर में उसका कारोबार बढ़ता गया और लगभग २० दिन बाद लाखों की ठगी कर वो फरार हो गया.. दोषी कौन? ठग? एक हद तक .. पर असली वजह है हमारा लालच.. हम अपने लालच की पट्टी आंखों पर बांध किसी चमत्कार की आशा में गाढे़ खुन पसीने की कमाई किसी के हवाले कर देते है और थोड़े समय बाद हाथ मलते रह जाते हैं.. और दोष देते हैं कि कोई हमें ठग गया...
सवाल है हमारी व्यवस्था का भी है.. जब ये चमत्कार प्रचारित किया जाता है और घटित हो रहा होता है उस समय हमारी पुलिस, मीडिया, जागरुक नागरिक कहाँ होते हैं.. क्यों हम अपने आस पास की घटनाओं से अन्जान अपनी दुनिया में खोये रहते हैं..
जब तक ये होता रहेगा नटवरलाल आते रहेंगें और ठगी होती रहेगी?
अगर बहुत भारी हो गया हो तो आदि के ब्लोग का एक चक्कर लगा आईये,चहरे पर फिर से मुस्कान आ जायेगी गारंटी से!!
ये तो स्टाफ है..
२६ नवंबर के बाद भी हम कितने लापरवाह है ये आज सुबह फिर से देखने को मिला.. मुंबई एयरर्पोर्ट के गेट नं १B से प्रवेश करते हुऐ मैने देखा कि CSIF के १०-१२ जवानों को बिना किसी जाँच के एयरपोर्ट में दाखिला मिल रहा है..
ये जवान सुरक्षा कर्मी के पीछे से आराम से प्रवेश कर रहे थे.. मन में शंका हुई.. प्रश्न उठे.. एसा क्यों.. ये सुरक्षाकर्मी इतना विश्वास से कैसे ढील दे रहा है....रहा नहीं गया..और पुछ लिया.. जबाब मिला "ये तो स्टाफ है..." मैने कहा पर कम से कम आई कार्ड तो देख सकते हैं.. क्या पता कोई नापा्क इंसान हो.. कुछ जबाब नहीं मिला...
अपनी चिन्ता वहां के अधिकारी को बताई.. उसने गोपनियता का हवाला दे लापरवाही छुपाने की कोशिश की...
ये् है हमारी सु्रक्षा..
(IT 4147 bay 27 से)
तीसरी खुशी
सुबह ८ बजे आदि को बाय कर घर से निकला तो याद आया कि कुछ जरुरी पेपर भूल गया हूँ.. फिर से घर लौटा तो लग रहा था आज ८.१० वाली मेट्रो छूट जायेगी.. आज लेट हो जाऊंगा.. जल्दी से पेपर लेकर दौड़ते हुए घर से निकला.. सरपट गाड़ी दौडाया.. जैसे ८.१० कि ट्रेन न मिली तो पता नहीं क्या हो जायेगा... गाड़ी पार्क कर दौडते हुऐ स्टेशन में दाखिल हुआ.. "इंद्रप्रस्थ की और जाने वाली मेट्रो प्लेटफोर्म पर आ रही है.." सुरक्षा जांच में जाते हुऐ ट्रेन की आवाज सुनाई दी... सुरक्षा कर्मी की और गिड़्गीडाते हुए देखा आंखे कह रही थी "भाई जल्दी जाने दे".. वो भी शायद समझ गया.. वंहा से निकला तो दो असंमझस था... स्वचालित सिढ़ी से जाऊ या सिढ़ी से.. देर हो रही थी.. अतः खुद पर भरोसा करना ज्यादा उचित समझा.. सिढ़ी की ओर लपक लिया.. उछलते कुदते सिढी़ चढा.. देखा सामने मेट्रो रानी खड़ी थी.. तुरंत अंदर दाखिल हुआ.. जैसे कोई किला फतह कर लिया.. मन ही मन खुद की प्रसंशा.."वाह प्यारे तुमने तो कर दिखाया.." ये थी आज की पहली खुशी..
जब ट्रेन में दाखिल हुए तो लालच और बढा़... एक सीट मिल जाये तो क्या कहने... आंखे इधर उधर ताकने लगी.. अभी गुजांइश थी.. कुछ सीट खाली थी.. लपक लिये.. देखा वो तो आरक्षित है.. उस पर बैठना नादानी होगी.. कुछ ही देर में उठा दिये जाओगे.. फिर क्या दुसरे कोच में दाखिल हुए.. सामने देखा एक सीट मेरा इन्तजार कर रही थी.. कोई और आये इससे पहने ही तुरंत अपना हक जता दिया.. सीट पर बैठ कर एक गहरी सांस ली.. लगा आज का दिन कितना अच्छा है.. काश उपर वाले से कुछ और मांगा होता!! दौड़ भाग कर सांस फूल चुकी थी.. कुछ गहरी सांस ले खुद को सामान्य किया.. ये थी आज की दुसरी खुशी....
कुछ देर बाद सांस सामान्य हुई तो अखबार की याद आई, थैला देखा तो पता चला की आज तो जल्दबाजी में घर ही भूल आये है.. अब अपने लिये कुछ नहीं बचा था.. तो नजरें ऊपर उठाई.. आस पास देखा.. अचानक नजरें रुक गई.. दुसरे कोच में एक महिला खड़ी थी.. हाथ में दो ढाई साल का बच्चा.. उसकी और देखा.. जब नजर मिली तो "अपनी" सीट से उठते हुऐ उसे "सीट" ऑफर की.. उसके साथ उसके पति भी थे.. तुरंत ही मेरी तरफ बढ़ गये.. इतने में खाली सीट देख कुछ और लोग उस तरफ बढे पर आंख से इशारा कर उन्हें मना किया.. वो मान भी गये.. अब महिला और बच्चा उस सीट पर बैठे थे.. और मैं उनके सामने ही खड़ा था.. महिला के होठ हिले.. पर आवाज नहीं आ रही थी.. लेकिन उसकी आंखे शायद मुझे धन्यवाद कह रही थी.. माँ और बच्चा दोनों खुश थे आराम से थे.. और मैं खडे़ खडे़ "तीसरी खुशी" के बारे में सोचता हुआ सफर कर रहा था....
महंगी पड़ी काग्रेस..
दिल्ली चुनावों में भाजपा के चुनाव की पंच लाईन.. कहते है अरुण जेटली के दिमाग की उपज थी..."महंगी पड़ी काग्रेस.. ".. भाजपा को वोट दें...
शायद अरुणजी दिल्ली की जनता को नहीं जानते, वो मंहगी चीजें ही पंसद करेती है.... तभी तो शीला जी आन 45 का आंकडा के खुश हो रही है...और ये स्लोगन अब अरुण जी को मंहगा पड़ गया..
मत ध्यान बटाओं हमारा...
मुंबई में आतंकी हमले के बाद अंग्रेज दुम दबा कर भाग गये... ७-० से हारने से बेहतर था ५-० से हारना..
पूरा देश नेताओं से हिसाब माँग रहा है और आम आदमी इंसाफ कि उम्मीद में खडा़ है.. हम आक्रोशीत है.. और action चाहते है.. नेता अपना मानसिक संतुलन खो चुके और ’बक’ रहे है..
शायद जनता का ये आक्रोश वो झेल नहीं पा रहे और action लेने की हिम्मत है नहीं.. हमारा और मिडिया का ध्यान बांटने अब वो नई साजिश कर रहे है... भगौडे़ अंग्रेजो को फि़र से बुला रहे है.. सोचते है.. कि हम क्रिकेट देखेगें.. और थोडे दिनों में भूल जायेगें मुंबई को..
सावधान.. ये कोशिश कामयाम न होने देगें.. नहीं देखना हमें गिल्ली डण्डे का खेल..
मत कोशिश करों हमारा ध्यान बांटने की..
हमे हिसाब दो..
इंसाफ दो..
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